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रविवार, 25 जनवरी 2015

द वॉयज ऑफ बीगल

चार्ल्स डार्विन का जन्म, दो सौ साल पहले, १२ फरवरी, १८०९ को, श्रेस्बरी में हुआ था। उनके पिता चिकित्सक थे। आठ साल की उम्र में उनकी मां का देहान्त हो गया। अगले छ: साल उन्होंने विभिन्न स्कूलों में पढ़ाई की, जहां वे एक औसत विद्यार्थी रहे।
१६ साल की उम्र में उन्होंने चिकित्सा पढ़नी शुरू की पर यह उन्हें रास नहीं आयी। १८ साल की उम्र में, पिता के कहने पर, आध्यात्मविद्या (Theology) की शिक्षा लेकर पादरी बनने की सोची पर यह न हो सका। उन्हें प्राकृतिक इतिहास में रूचि थी। इसलिए उन्होंने, इसकी पढ़ाई, अपने वनस्पति विज्ञान (Botany) के प्रोफेसर, जान स्टीवेन्स् हेन्सलॉ की देख-रेख में शुरू की। २२ वर्ष की उम्र में, डार्विन के पास कोई भी पेशा नहीं था उसका भविष्य अंधकारमय था, उसके समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें। तभी उन्हें अपने प्रोफेसर हेन्सलॉ के कारण, एक पत्र मिला -
'क्या आप एच.एम.एस बीगल नामक पानी की जहाज पर प्राकृतिक विशेषज्ञ के रुप में दुनिया की सैर करना चाहेंगे।'
डार्विन ने इसे स्वीकार कर लिया। इस समुद्र यात्रा न केवल उसके जीवन की पर दुनिया की ही दिशा बदल दी। यह समुद्र यात्रा २७ दिसम्बर १८३१ को शुरू हुई। इसे दो साल में समाप्त होना था पर इसे लगभग पांच साल लगे। यह २ अक्टूबर १८३६ में समाप्त हुई। समुद्र यात्रा के समय, डार्विन परम्परा वादी थे और अक्सर बाईबिल को उद्घरित करते थे लेकिन समुद्र यात्रा समाप्त होते- होते यह बदलने लगा। डार्विन का विश्वास, बाईबिल से उठने लगा। उसे लगा प्राणियों के उत्पत्ति के बारे में बाईबिल में लिखी कथा सच नहीं है। बाद के जीवन में उन्होंने चर्च भी जाना बन्द कर दिया। डार्विन को इस बात की चिन्ता लगने लगी कि मज़हब का, किस तरह से प्रचार किया जाता है। उसे लगने लगा कि यह लोगों को तर्क या तथ्य से नहीं, पर बचपन से ही घुटी पिला कर किया जाता है। जिसके कारण वे अपने बाद के जीवन में उससे बाहर नहीं निकल पाते हैं। डार्विन का बड़ा पुत्र विलियम, रग्बी स्कूल में पढ़ता था। यह स्कूल मज़हबी शिक्षा पर जोर देता था। डार्विन को लगा कि वहां जाकर उसका कौतूहल समाप्त हो रहा है, वह मंद हो रहा है - इसलिए उसने अपने बाकी चार पुत्रों को ग्रामर स्कूल में डाला। यह स्कूल कम जाने माने स्कूल थे पर वहां विज्ञान का वातावरण था।एचएमएस बीगल, पानी के जहाज ने, तीन समुद्री यात्राएं कीं। इसकी पहली यात्रा में, प्रिंगल स्टोकस् (Pringle Stokes) इसके कप्तान थे। शायद अच्छा साथ न होने के कारण, वे अकेलपन और उदासी के शिकार हो गये। उन्होंने खुदकुशी कर ली। तब रॉबर्ट फिट्ज़रॉय को उसका कप्तान बनाया गया था। बीगल की दूसरी यात्रा में रॉबर्ट ही इसके कप्तान थे। वे जगहों को समझने और सर्वे करने के लिये, किसी पदार्थविज्ञानी (Naturalist) को अपने साथ ले जाना चाहते थे। पहले कप्तान की अकेलेपन और उदासी के कारण मृत्यु ने भी, उन्हें किसी को साथ ले जाने की बात को बल दिया। इसलिये दूसरी यात्रा में डार्विन को, जाने का मौका मिला। यह समुद्र यात्रा २७ दिसम्बर १८३१ को शुरू हुई। इसे दो साल में समाप्त होना था पर इसे लगभग पांच साल लगे। यह २ अक्टूबर १८३६ में समाप्त हुई। इस यात्रा के दौरान, डार्विन गैलापगॉस द्वीप समूह पर भी गये। यह द्वीप समूह प्रशान्त महासागर में इक्वेडर से लगभग १००० (९७२) किलो-मीटर पश्चिम पर है। यहाँ पर पाये जाने वाले पक्षी और जानवर दक्षिण अमेरिका में पाये जाने वाले पक्षी और जानवरों से कुछ भिन्न थे पर उनमें महत्वपूर्ण समानता भी थी।डार्विन ने गैलापगॉस द्वीप समूह पर, १३ तरह की चिड़ियों को एकत्र किया था। उनके अध्ययन से पता चला कि वे सब फिंचेस् (छोटी गाने वाली चिड़ियां) हैं पर उनकी चोंच अलग-अलग तरह की थी।डार्विन सोचने लगे कि फिंचेस् की चोंच क्यों अलग हो गयी, इसका क्या कारण था? क्या इन फिंचेस् के पूर्वज एक ही थे और समय बीतने के साथ, नये वातावरण में, खाना प्राप्त करने की सुविधानुसार ढ़ालने के कारण, उनकी चोंच ने अलग-अलग रूप ले लिया? डार्विन को लगा कि यदि, फिंचेस् में बदलाव आ सकता है तो यह सारे जैविक जीवन में, प्राणी जगत में क्यों नहीं हो सकता है। क्या सारी जातियों, उपजातियों का विकास एक ही पूर्वज से हुआ है? क्या जातियों, उपजातियों में बदलाव प्रकृति के सांयोगिक उत्परिवर्तन (chance mutation) के कारण हुआ, जिसमें प्राकृतिक वरण का महत्वपूर्ण योगदान रहा, और वही जीवित रहा जो उत्तरजीविता के लिए योग्यतम (survival of fittest) था?१८३८ में, डार्विन ने, थॉमस मालथुस की लिखी पुस्तक 'ऎसे ऑन द प्रिन्सिपल आफ पॉप्युलेशन' (Essay on the principle of Population) पढ़ी। इस पुस्तक ने इस सिद्घान्त को पक्का किया। समुद्र यात्रा के दौरान इकट्ठा किये पक्षी और जानवरों के नमूने भी इसी सिद्वान्त की तरफ इंगित करते थे। लेकिन, इस सिद्वान्त के बाइबिल में दिये प्राणियों की उत्पत्ति के विरूद्व होने के कारण, डार्विन इसे प्रतिपादित करने में चुप रहे पर बाइबिल और भगवान के बारे में उनकी सोच बदल गयी। उनका इन पर से विश्वास उठने लगा। उन्होंने, बाद में, चर्च जाना भी बन्द कर दिया। १८३९ में, डार्विन ने समुद्र यात्रा के संस्मरण 'द वॉयज ऑफ बीगल' नाम से लिखी। इस पुस्तक ने उसे प्रसिद्घि दिलवायी। फिर भी, डार्विन प्राणियों की उत्पत्ति के सिद्घान्त को प्रकाशित करने की हिम्मत नहीं जुटा पाये। इसका एक कारण यह भी था कि उसकी पत्नी कट्टर इसाई थीं, वह उसे दुखी नहीं करना चाहते थे। किन्तु एक १८ जून १८५८ में मिले एक पत्र ने, सब कुछ बदल दिया। डार्विन को १८ जून १८५८ को मिला पत्र, अल्फ्रेड रसल वॉलेस ने लिखा था। वॉलेस ने अपने पत्र में, प्राणियों की उत्पत्ति के बारे में उसी सिद्धांत को लिखा था जिस पर डार्विन स्वयं पहुँचे थे। लेकिन, वॉलेस के पास, इसके लिए तथ्य नहीं थे। इस सिद्धांत को विश्वसनीयता का जामा पहनाने के लिए, तथ्य डार्विन के ही पास थे। १ जुलाई १८५८ को, डार्विन और वॉलेस के संयुक्त नाम से, एक पेपर लंदन की लिनियन सोसाइटी में पढ़ा गया। इस पेपर में इस सिद्धांत की व्याख्या की गयी थी। मोटे तौर पर यह बताता है –
'Evolution is result of chance mutation and natural selection, where survival of the fittest played crucial role.'प्राणी जगत का विकास संयोगिक उत्तपरिर्वन, प्राकृतिक वरण, और योग्यतम की उत्तर जीविका पर आधारित है। डार्विन बेहतरीन व्यक्तित्व के भी मालिक थे डार्विन के लिए यह आसान था कि वह वॉलेस का पत्र छिपा जाते और तथ्यों के साथ सिद्धांत को अपने नाम से प्रकाशित कर देते। लेकिन उन्होंने ऐसा नही किया। डार्विन के विचार गुलामी के भी विरूद्ध थे जबकि बीगल के कप्तान फिट्ज़रॉय की राय में यह गलत नहीं था। वे इसकी सफाई देते थे। फिट्ज़रॉय के इन विचारों के लिये, डार्विन ने उसकी निन्दा भी की। इसके कारण बीगल से उसकी नौकरी जाते, जाते बची। ब्राज़ील में उन्हें वहां के जंगलों की सुंदरता तो भायी पर गुलामी ने दुखी किया। वहां से निकलने के बाद डार्विन ने कहा,
'I thank God I shall never again visit a slave country '
मैं भगवान को धन्यवाद दूँगा कि मुझे फिर कभी ग़ुलामों के देश में न जाना पड़े।




मालिक थे डार्विन के लिए यह आसान था कि वह वॉलेस का पत्र छिपा जाते और तथ्यों के साथ सिद्धांत को अपने नाम से प्रकाशित कर देते। लेकिन उन्होंने ऐसा नही किया।
डार्विन के विचार गुलामी के भी विरूद्ध थे जबकि बीगल के कप्तान फिट्ज़रॉय की राय में यह गलत नहीं था। वे इसकी सफाई देते थे। फिट्ज़रॉय के इन विचारों के लिये, डार्विन ने उसकी निन्दा भी की। इसके कारण बीगल से उसकी नौकरी जाते, जाते बची। ब्राज़ील में उन्हें वहां के जंगलों की सुंदरता तो भायी पर गुलामी ने दुखी किया। वहां से निकलने के बाद डार्विन ने कहा,
'I thank God I shall never again visit a slave country '
मैं भगवान को धन्यवाद दूँगा कि मुझे फिर कभी ग़ुलामों के देश में न जाना पड़े।

बुधवार, 24 सितंबर 2014

रोटी जरूरी है या मंगल और चांद पर जाना?...

हमें पहले क्या करना चाहिए? रोटी जरूरी है या मंगल और चांद पर जाना? इस मुद्दे पर इसरो चीफ के राधाकृष्णन के विचार, मंगलयान के मंगल की कक्षा में सफल प्रवेश के अवसर पर वॉयेजर की खास प्रस्तुति-

'इसरो में ये सवाल हमलोग हर दिन खुद से पूछते हैं. हम इस बारे में सोचते हैं कि हम जो कर रहे हैं इससे जनता को, सरकार को फायदा होता है या नहीं. इसरो का काम सिर्फ रॉकेट उड़ाना नहीं है. 24 सेटेलाइट हैं अंतरिक्ष में हमारे. बड़ा कम्यूनिकेशन इनफ्रास्ट्रक्चर बनाया है हमने. करीबन 200 ट्रांसपॉन्डर हैं जिनके जरिए मछुआरों की मदद हो रही है. उन्हें समुद्र में किस जगह पर ज्यादा मछली मिलेगी, इसकी जानकारी उपलब्ध कराते हैं हम.
 हम गलत अवधारणा में हैं कि इसरो का काम सिर्फ रॉकेट उड़ाना है. बल्कि हम जो काम करते हैं वो सीधे या फिर परोक्ष तौर पर देश की सरकार और जनता के हित में काम आता है. इसरो द्वारा भेजा गया रॉकेट और सेटेलाइट लोगों को रोटी देने का काम भी करता है. किसी किसान या फिर मछुआरे से पूछिए.
वैज्ञानिक समझ को बढ़ाने के साथ तकनीकी बेहतरी पर इसरो ने बहुत कुछ किया है. मिशन टू मून हो या मिशन टू मार्स, इसरो ने सिर्फ ये दो काम ही नहीं किए. हमने स्ट्रेटजिक मूवमेंट में भी अहम भूमिका निभाई है.
1960 से आज तक यही पूछा जाता है कि भारत जैसे गरीब देश को स्पेस में एयरक्राफ्ट भेजना चाहिए या नहीं? हर प्रोजेक्ट के साथ यही सवाल उठता है. ये सवाल उठते रहेंगे. पर मैं भी एक सवाल पूछना चाहता हूं कि क्या भारत जैसे देश को स्पेस साइंस में इनवेस्ट नहीं करना चाहिए, जो सुपरपावर बनना चाहता है?
फसलों से बेहतर उपज, तूफान की जानकारी, इस तरह की अहम जानकारियां जुटाने में हमारे सेटेलाइट काम में आ रहे हैं. तूफान फेलिन की जानकारी इनसेट सेटेलाइट से मिली. करीब 400 से ज्यादा तस्वीरें हमें मिलीं जिसके जरिए हजारों जानें बचाई जा सकीं. हमारे पास रॉकेट होने चाहिए क्योंकि सेटेलाइट्स को अंतरिक्ष में भेजना है. भूख मिटाना जरूरी है पर स्पेस साइंस को नजरअंदाज नहीं कर सकते. आखिरकार ये भी तो रोटी देने में मदद करता है.'
(इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में Rockets vs Rotis में इसरो प्रमुख डॉ.के राधाकृष्णन के व्याख्यान के अंश)

...इसलिए, मंगल पर हमारा जाना जरूरी है!

 ‘मार्स ऑरबिटर मिशन’ की कामयाबी के साथ ही एक पुराना सवाल फिर सामने है कि क्या भारत जैसे विकासशील देश में, जहां भारी तादाद में लोग अब भी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसी बुनियादी जरूरतों के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं, वहां 450 करोड़ रुपये मंगल अभियान पर खर्च करना जायज है? ये एक सार्वकालिक सवाल है और केवल भारत ही नहीं बल्कि अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी वैज्ञानिक समुदाय को इन सवालों का सामना करना पड़ता है. इस बार मंगलयान के साथ ये सवाल कुछ ज्यादा ही जोरदारी के साथ उठाया गया. एक न्यूज चैनल ने तो बकायदा ये भी दिखाया कि 450 करोड़ रुपये में सरकार लोगों के लिए क्या-क्या काम कर सकती थी.
बात केवल मंगलयान की नहीं है. भारत के कुछ और साइंस प्रोजेक्ट्स आने वाले वक्त में पूरे होने हैं, जिनकी लागत करोड़ों में है, मिसाल के तौर पर तमिलनाडु के पास बन रही देश की पहली अंडरग्राउंड न्यट्रिनो लैब, जिसकी लागत 150 करोड़ रुपये से ज्यादा है, उत्तराखंड के देवस्थल में एशिया के सबसे बड़े 13.5 मीटर के टेलिस्कोप की ऑब्जरवेटरी को बनाने का काम जारी है जिसकी लागत करीब 120 करोड़ रुपये है, चंद्रयान-2 जिसकी लागत 426 करोड़ रुपये है और इसके अलावा भारत आर्कटिक और अंटार्कटिक में स्थायी स्टेशंस चला रहा है, जिसकी सालाना लागत भी कई सौ करोड़ है. सवाल फिर वही कि क्या भारत को साइंस पर भारी खर्च करना चाहिए?
 देश में बीएमडब्लू जैसी करोड़ों की कीमत वाली विदेशी गाड़ियों के बढ़ते महंगे शौक की बात न भी करें तो मंगलयान और साइंस के दूसरे प्रोजेक्ट्स पर हो रहे खर्च पर हाय-तौबा मचाने वाले लोग ये भूल जाते हैं भारत साइंस पर जितना खर्च करता है, उससे कई गुना ज्यादा पैसा इस देश में लोग सिगरेट और शराब पर उड़ा रहे हैं. भारत में सिगरेट का सालाना बाजार 720 अरब रुपये का है. आईटीसी जैसे सिगरेट के बड़े ब्रांड इसे और विस्तार देने के लिए जल्दी ही 25000 करोड़ रुपये और खर्च करने जा रहे हैं. शराब की बात करें तो देश में इस नशे का फुटकर बाजार 2100 अरब रुपये का है. इस नशीले एश्वर्य में झूमते विजय माल्या जैसे लोग फार्मूला-वन और कैसीनो जैसी चीजों को देश में ला रहे हैं और नई पीढ़ी के ‘रोल मॉडल’ बन रहे हैं. लोग सिगरेट और शराब पर एक साल में 2800 अरब रुपये से ज्यादा उड़ा रहे हैं. ये रकम इस बार के केंद्रीय बजट में दर्शाये गए देश के कुल वास्तविक खर्च से भी ज्यादा है.
जब भी हम साइंस पर खर्च करते हैं, अंतरिक्ष पर खर्च करते हैं या किसी नई खोज के लिए खर्च करते हैं, तो हमेशा ये निवेश बोनस के साथ कई-कई रास्तों से वापस हमारे पास लौटता है. ‘चंद्रयान’ देश के अंतरिक्ष अनुसंधान का टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ था. चंद्रयान की लागत 354 करोड़ रुपये थी, लेकिन जब चंद्रयान ने चंद्रमा पर पानी खोज निकाला तो इससे देश को जो विश्वस्तरीय प्रतिष्ठा अर्जित हुई वो नासा और यूरोपियन स्पेस एजेंसी को दशकों की मेहनत और अरबों डॉलर खर्च करके भी नहीं मिल सकी थी.
साइंस अनुसंधान पर होने वाला खर्च मानवता के लिए जीवन बीमा के जैसा निवेश है, जो हमेशा मानवता के भविष्य को बेहतर और सुरक्षित बनाने के लिए किया जाता है. यही वजह है कि 100 साल से ज्यादा वक्त और बीत जाने के बावजूद कैंसर पर रिसर्च अब भी जारी है. एड्स पर विजय पाने की जंग भी पिछले 30 साल से लगातार जारी है. इन लड़ाइयों पर अब तक अरबों डॉलर खर्च हो चुके हैं, वैज्ञानिकों की कई पीढ़ियों ने बगैर किसी ठोस नतीजे के अपनी पूरी जिंदगी इन रोगों पर विजय पाने की कोशिश में खपा दी है. लेकिन समय, पैसे और प्रतिभा के इस लंबे और लगातार निवेश के बदौलत ही अब हमें इन रोगों की लड़ाईयों की अंधी सुरंगों के दूसरे सिरे पर उम्मीद की रोशनी नजर आ रही है. एचआईवी पर काबू पा लिया गया है और कैंसर के खिलाफ भी निर्णायक टीका बस आने को है.
 भारत में जरूरत इस बात की है कि वैज्ञानिक अनुसंधान पर होने वाले सकल खर्च को व्यवस्थित और जवाबदेह बनाया जाए. मैंने जब सीएसआईआर के महानिदेशक समीर ब्रह्मचारी से पूछा कि पिछले 5 साल के दौरान आपकी सबसे बड़ी उपलब्धि क्या रही? तो काफी याद करने के बाद उन्होंने ‘ई-रिक्शा’ का नाम लिया. अब अगर देशभर में दर्जनों प्रयोगशालाओं और सरकारी वैज्ञानिकों की भारी-भरकम फौज वाला संगठन सीएसआईआर करोड़ों के बजट को खर्च कर 5 साल में देश के लिए बस ‘ई-रिक्शा’ ही बना सका है. तो इससे देश में वैज्ञानिक अनुसंधान के नाम पर जो चल रहा है, उसका खुलासा होता है और ये वाकई गहरी चिंता का विषय है. देश में वैज्ञानिकों को रिसर्च प्रोजेक्ट्स के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये आवंटित करा दिए जाते हैं. इसके बाद ऐसी कोई एजेंसी नहीं है जो वैज्ञानिकों से उनके प्रोजेक्ट्स के बारे में जवाब-तलब करे और पैसों की निगरानी करे. 15 से 20 साल तक वैज्ञानिक प्रोजेक्ट्स चलते रहते हैं और साथ में कई सहायक परियोजनाएं भी शुरू हो जाती हैं, विदेश यात्राएं चलती रहती हैं और पैसा बर्बाद होता रहता है. अंत में कोई भी ठोस वैज्ञानिक खोज सामने नहीं आती. जरूरत इस बात की है कि देश में वैज्ञानिक प्रोजेक्ट के लिए एक नियामक एजेंसी बने, जिसमें शीर्ष वैज्ञानिक शामिल हों और जो ये तय करे कि प्रोजेक्ट्स तय समय सीमा में ही पूरे हों, शोध कर रहे वैज्ञानिकों जवाबदेही तय हो, एक तय समयसीमा में शोध पूरे हों और उन प्रोजेक्ट्स के नतीजों का फायदा केवल उस वैज्ञानिक या उसके परिवार को नहीं बल्कि पूरे देश के लोगों को मिले.
संदीप निगम

मंगलवार, 23 सितंबर 2014

भारत...अब मंगल की कक्षा में

भारत अब मंगल की कक्षा में पहुंच चुका है. देश ने सीमित संसाधनों में असाधारण उपलब्धि अर्जित की है. मंगलयान ने भारत को दुनिया के ऐसे पहले देश का गौरव दिला दिया है मंगल पर पहुंचने की जिसकी पहली ही कोशिश कामयाब रही है.
भारत के मंगल अभियान का निर्णायक चरण 24 सितंबर को सुबह यान को धीमा करने के साथ ही शुरू हो गया था. मंगलयान की गति धीमी करनी थी ताकि ये मंगल की कक्षा में गुरूत्वाकर्षण से खुद-बखुद खिंचा चला जाए और वहां स्थापित हो जाए.
मंगलयान से धरती तक डेटा पहुंचने में करीब 12:30 मिनट का समय लग रहा है. सुबह लगभग 8.00 बजे इसरो को मंगलयान से सिग्नल प्राप्त हुआ और ये सुनिश्चित हो पाया कि मंगलयान मंगल की कक्षा में स्थापित हो गया है.
मंगलयान का आकार लगभग एक नैनो कार जितना है, तथा संपूर्ण मार्स ऑरबिटर मिशन की लागत कुल 450 करोड़ रुपये या छह करोड़ 70 लाख अमेरिकी डॉलर रही है, जो एक रिकॉर्ड है. यह मिशन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइज़ेशन या इसरो) ने 15 महीने के रिकॉर्ड समय में तैयार किया.

नासा का मैवेन पहले पहुंचा
भारत के पहले मंगलयान से 48 घंटे पहले नासा का 'मैवेन' ने मंगल की कक्षा में प्रवेश किया. 'मैवेन' लाल ग्रह यानी मंगल के वातावरण का अध्ययन करेगा. 'मैवेन' से मिलने वाले आँकड़ों से वैज्ञानिकों को मंगल के वर्तमान और अतीत के वातावरण की परिस्थितियों का बेहतर मॉडल विकसित करने में मदद मिलेगी.

मंगलयान के महानायक

के. राधाकृष्णन -
इसरो के चेयरमैन और स्पेस डिपार्टमेंट के सेक्रेट्री के पद पर कार्यरत हैं. इस मिशन का नेतृत्व इन्हीं के पास है और इसरो की हर एक एक्टिविटी की जिम्मेदारी इन्हीं के पास है.

एम. अन्नादुरई - इस मिशन के प्रोग्राम के डायरेक्टर के पद पर कार्यरत हैं. इन्होंने इसरो 1982 में ज्वाइन किया था और कई प्रोजेक्टों का नेतृत्व किया है. इनके पास बजट मैनेजमेंट, शैड्यूल और संसाधनों की जिम्मेदारी है. ये चंद्रयान-1 के प्रोजेक्ट डायरेक्ट भी रहे हैं.

एस. रामाकृष्णन - विक्रमसाराबाई स्पेस सेंटर के डायरेक्टर हैं और लॉन्च अथोरिजन बोर्ड के सदस्य हैं. उन्होंने 1972 में इसरो ज्वाइन किया था और और पीएसएलवी को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

एसके शिवकुमार - इसरो सैटेलाइट सेंटर के डायरेक्टर हैं. इन्होंने 1976 में इसरो ज्वाइन किया था और इनका कई भारतीय सैटेलाइट मिशनों में योगदान रहा है.

इनके अलावा पी. उन्नीकृष्णन, चंद्रराथन, एएस किरण कुमार, एमवाईएस प्रसाद, एस अरूणन, बी जयाकुमार, एमएस पन्नीरसेल्वम, वी केशव राजू, वी कोटेश्वर राव का भी इस मिशन में अहम योगदान रहा.

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

जिंदगी का असली मजा खोज में है: प्रो. हॉकिंग


अमेरिका की कैलीफोर्निया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी का दर्शकों से खचाखच भरा बेकमैन ऑडिटोरियम। कई मशहूर वैज्ञानिक, पीएचडी स्टूडेंट्स और रिसर्च स्कॉलर्स सीट के लिए मशक्कत कर रहे हैं। जितने लोग सीट्स पर बैठे हैं, उनसे ज्यादा किनारों पर खड़े नजर आ रहे हैं। जो लोग सीट्स नहीं पा सके उनमें मशहूर फिजिसिस्ट बिल नाई और यूनिवर्सिटी आफ कैलीफोर्निया लॉस एंजिल्स के प्रोफेसर एलन युइले भी हैं। ये गहमा-गहमी और इंतजार काफी खास है, क्योंकि ऑडिटोरियम की स्पॉटलाइट महान एस्ट्रोफिजिसिस्ट प्रो. डॉ. स्टीफन हॉकिंग पर है और आज वो साइंस के साथ अपनी शुरुआती जिंदगी और अपने जुनून से जुड़ी कई बातों को भी साझा करेंगे। ...पेश है वॉयेजर की खास प्रस्तुति-

अचानक हलचल बढ़ गई और सबकी निगाहों के साथ स्पॉट लाइट ऑडिटोरियम के दाईं ओर घूम गई, अपनी व्हीलचेयर को ऑपरेट करते हुए प्रो. हॉकिंग वहां से मंच पर प्रवेश कर रहे हैं...और इसी के साथ ऑडिटोरियम में खामोशी छा गई। टॉक की शुरुआत प्रो. हॉकिंग ने अपने चिर-परिचित मजाकिया अंदाज में की। ऑडिटोरियम के स्पीकर्स पर प्रो. हॉकिंग की सेंथेसाइजर आवाज गूंजी.....

... कैन यू हियर मी?....

" जिंदगी का असली मजा खोज में है, एक नई और ऐसी खोज जिसके बारे में लोग पहले से कुछ भी न जानते हों। इस खोज, इस तलाश की तुलना मैं सेक्स से नहीं कर सकता, लेकिन इसकी खुमारी, इसका आनंद कहीं ज्यादा देर तक बरकरार रहता है।"

(इसी के साथ ऑडिटोरियम में ठहाके गूंज उठते हैं)

"बीते 49 साल से मै हर दिन मौत की आशंका के बीच जी रहा हूं। मुझे मरने से डर नहीं लगता लेकिन मुझे मरने की ऐसी कोई खास जल्दी भी नहीं है। ऐसे कई काम हैं जो मैं पहले करना चाहता हूं। जब वक्त से पहले आपका सामना मृत्यु की संभावना से होता है, उस क्षण आपको इसका अहसास होता है कि जिंदगी वाकई जीने के लायक है, और ऐसी तमाम सारी चीजें हैं जो आप करना चाहते हैं।

मेरे हिसाब से दिमाग एक कंप्यूटर की तरह है, जो तब काम करना बंद कर देता है जब इसके दूसरे हिस्से खराब हो जाते हैं। टूटे और एकदम खराब हो चुके कंप्यूटर के लिए कोई दूसरी जिंदगी और स्वर्ग जैसी चीजें नहीं होतीं। स्वर्ग-नर्क और मौत के बाद दूसरी जिंदगी की बातें ऐसे लोगों की कल्पनाएं भर हैं, जिन्हें अंधेरों से डर लगता है। दर्शऩशास्त्र और आध्यात्म का अध्ययन समय की बरबादी से ज्यादा कुछ नहीं, क्योंकि क्योंकि इनकी ज्यादातर बातें प्रायोगिक साक्ष्यों और आधुनिक विज्ञान के खिलाफ हैं।

बचपन में मेरा क्लासवर्क अशुद्धियों से भरा बेतरतीब होता था और मेरी हैंडराइटिंग तो मेरे शिक्षकों को निराशा से भर देती थी। लेकिन लड़कपन के मेरे दोस्तों ने मेरा नाम आइंस्टीन रख दिया था, मुझे तो पता नहीं, लेकिन शायद उन्हें मुझमें ऐसे कोई बेहतर लक्षण नजर आते होंगे। जब मैं 12 साल का था तब मेरे एक दोस्त ने दूसरे दोस्त के साथ ये कहते हुए चॉकलेट के एक पैकेट की बाजी लगाई थी कि देखना ये नालायक का नालायक ही रहेगा।

जब मैं ऑक्सफोर्ड आया तो दाखिले से पहले मुझे एक एक्जाम और देना पड़ा, इस परीक्षा का नतीजा ये रहा कि अगले तीन साल मुझे ऑक्सफोर्ड में बिताने पड़े, जिसका अंत एक और एक्जाम के साथ हुआ। मैंने एक बार गणित लगाया तो पता चला कि ऑक्सफोर्ड में तीन साल के दौरान मैंने एक हजार घंटे का काम किया। लेकिन औसतन ये बस रोजाना एक घंटे ही था, इसलिए मैं किसी शाबासी का दावा नहीं कर सकता था।

हमेशा एक छात्र बने रहना और कभी हिम्मत न हारना हमें आगे की ओर ले जाता है। याद रखिए, सितारों से भरे आसमान को देखिए और कभी घुटने मत टेकिए। आप जो देखते हैं महसूस करते हैं उसमें छिपे तार्किक अर्थ खोजिए। जिंदगी के हालात मुश्किल भी हो सकते हैं, लेकिन सबसे निराशाजनक परिस्थितियों में भी आपके लिए बहुत कुछ नया और अलग करने की गुंजाइश हमेशा छिपी रहती है। सफलता बस केवल एक ही बात पर निर्भर करती है और वो ये कि कभी हिम्मत मत हारिए।

हम सभी काफी भाग्यशाली हैं कि हम वक्त के ऐसे दौर में हैं जब थ्योरेटिकल फिजिक्स में नई-नई खोजें सामने आ रही हैं। बीते 40 साल के दौरान ब्रह्मांड के बारे में हमारी जानकारी में बहुत ज्यादा बदलाव आया है और ब्रह्मांड को लेकर हमारी समझ पूरी तरह बदल चुकी है और मुझे खुशी है कि इसमें मैं भी थोड़ा सा योगदान दे सका। हम मानव, जो कि प्रकृति के आधारभूत कणों के एक समूह मात्र हैं, उन नियमों को समझ सके जो हर पल हमपर और इस ब्रह्मांड पर असर डाल रहे हैं, ये सच्चाई पूरी मानव जाति के लिए एक बहुत महान जीत है।   

– संदीप निगम
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COMING SOON

डॉ. स्टीफन हॉकिंग का मशहूर व्याख्यान

 Life in the Universe

 पढ़िए हिंदी में

सोमवार, 21 अप्रैल 2014

स्पेस हॉरर 01: जब स्पेस वॉक के दौरान अंतरिक्षयात्रियों को नजर आना ही बंद हो गया!

‘वॉयेजर’ के पाठकों के लिए हम ‘स्पेस हॉरर’ के नाम से एक नई सीरीज शुरू कर रहे हैं. इस सीरीज में हम पाठकों को अंतरिक्ष अभियानों के दौरान घटे ऐसे हादसों की जानकारी देंगे, जब अंतरिक्षयात्रियों की जान खतरे में आ गई थी.
“कोई भी मुसीबत इतनी खराब नहीं होती, कि आप उसे और भी बदतर न बना सकें,” किसी शुरुआती अंतरिक्षयात्री की कही ये एक मशहूर कहावत है. इस कहावत को ध्यान में रखते हुए कल्पना कीजिए कि आप एक अंतरिक्षयात्री हैं जो स्पेसवॉक करके इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के बाहर कुछ मरम्मत का काम कर रहे हैं. तभी अचानक आपको कुछ भी नजर आना बंद हो जाए, आंखें खुली हैं लेकिन आप कुछ भी देख नहीं पा रहे हैं, आप अंधे हो गए ! टोटल ब्लाइंड ! आप धरती से करीब 400 किलोमीटर ऊपर खुले अंतरिक्ष में फंसे हैं जहां स्पेससूट के अलावा आपकी और कोई सुरक्षा नहीं है. ऐसे में अब आप क्या करेंगे ? आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी ?
कनाडा के रिटायर्ड अंतरिक्षयात्री और कुशल वक्ता क्रिस हैडफील्ड, जो इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के एक्सपीडिशन 35 के कमांडर भी थे, ने 2001 में ऐसे ही गंभीर हालात का सामना किया था. हैडफील्ड बताते हैं कि ऐसे हालात में नॉलेज, प्रैक्टिस और अंडरस्टैंडिंग ही डर का मुकाबला करने के लिए सबसे बेहतरीन हथियार साबित होते हैं. इस संबंध में दिए एक व्याख्यान में उन्होंने बताया कि जिस तरह एक मकड़ी अपने ही बुने जाल पर सावधानी से चलकर खुद को फंसने से बचाते हुए शिकार करने में कामयाब रहती है, ऐसी ही सतर्कता को अपनाकर हम अंतरिक्ष में कई खतरों का आसानी से मुकाबला कर सकते हैं. 
हैडफील्ड ने कहा, “तो अगर आप इन मकड़ियों से डरते हैं और सोंचते हैं कि ये आपको काट लेंगी और इनके जहर से आपकी मौत हो जाएगी तो आप कभी इनका सामना नहीं कर सकेंगे. मकड़ियों से घबराइए मत, इनसे सीखिए. इसी तरह अंतरिक्ष में कोई गंभीर खतरा सामने आने पर अगर आप उससे डरकर दूर भागेंगे और अपनी जान बचाने की तरकीब ढूंढेंगे तो समस्या का समाधान कभी नहीं कर सकेंगे. ध्यान रखिए हर समाधान हमेशा अपनी समस्या में ही छिपा रहता है. बस जरूरत इस बात की होती है कि बिना होश गंवाए आप उसे खोज निकालें. स्पेस शटल की पहली 5 उड़ानों के वक्त किसी अनहोनी के घटने की संभावना हमेशा 9 में से 1 रहती थी. जब 1995 में मैं पहली बार अंतरिक्ष गया और स्पेस स्टेशऩ मीर पहुंचा तो उस वक्त किसी हादसे के घटने की संभावना 38 में से 1 की थी. ”  
क्रिस हैडफील्ड ने व्याख्यान में अपने साथ अंतरिक्ष में पेश आए उस हादसे के बारे में भी बताया जब उनकी जान पर बन आई थी. 2001 में स्पेस शटल मिशन STS-100 के अंतरिक्षयात्रियों में कनाडा के क्रिस हैडफील्ड भी शामिल थे. हैडफील्ड मिशन के दौरान स्पेस शटल से बाहर स्पेसवॉक कर रहे थे तभी अचानक उनके हेलमेट में कोई चीज भर गई और उन्हें बाहर कुछ भी दिखाई देना बंद हो गया था. हैडफील्ड स्पेस शटल से बाहर थे और तभी अचानक उन्हें बाहर के नजारे दिखाई देने बंद हो गए. हेलमेट की पूरी स्क्रीन पर कोई तरल पदार्थ बिल्कुल पेंट की तरह फैल गया था. बिल्कुल अंधे से हो गए हैडफील्ड ने धीरज नहीं खोया और अपनी घबराहट को काबू में रखा. उन्होंने सबसे पहले स्पेस शटल के साथियों को जानकारी दी और फिर ह्यूस्टन कंट्रोल रूम को बताया कि वो स्पेस शटल से बाहर हैं और खुले अंतरिक्ष में उनकी स्थिति बिल्कुल किसी अंधे के जैसी हो गई है. कोई कुछ समझ पाता और हैडफील्ड को कोई समाधान मिल पाता इससे पहले हैडफील्ड ने खुद को स्पेस शटल से जोड़ने वाले केबल टेथर को टटोला और उसे पकड़-पकड़ कर वो सुरक्षित स्पेस शटल के भीतर आने में कामयाब रहे.
कनाडा के अंतरिक्षयात्री क्रिस हैडफील्ड के साथ घटी इस दुर्घटना के कुछ महीने बाद इटली के एक अंतरिक्षयात्री के साथ भी ऐसा ही हादसा घट गया. इटली का वो अंतरिक्षयात्री भी स्पेसवॉक कर रहा था, कि तभी ऑक्सीजन उपकरण में खराबी के चलते उसके नासा स्पेससूट में पानी भर गया था. पानी अंतरिक्षयात्री के हेलमेट में भी भरने लगा था और उस अंतरिक्षयात्री की जान पर बन आई थी.
अंतरिक्ष अभियानों में घटी हर दुर्घटना सुरक्षा के कुछ नए तरीकों को जन्म देती है. हैडफील्ड और इटली के अंतरिक्षयात्री के साथ स्पेस वॉक के दौरान पेश आए हादसों की विस्तार से जांच की गई. स्पेस सूट और ऑक्सीजन उपकरणों मे नए सुधार किए गए. इन हादसों ने स्पेस वॉक को अब और भी ज्यादा सुरक्षित बना दिया.

रविवार, 20 अप्रैल 2014

मानव को ब्रह्मांड से उसके रिश्ते की याद दिलाती है ये ‘धूल’!

 गर्मी का मौसम दस्तक दे रहा है. इसी के साथ हम गर्मियों में उड़ने वाली धूल-धक्कड़ से भरी आंधियों को सोंच-सोंचकर अभी से परेशान हो रहे हैं. मशहूर कहावत है, ‘इंडिया यानि हीट एंड डस्ट.’ धूल से घबराएं नहीं, इसे मामूली और जी का जंजाल मत समझें. आइए एक मुठ्ठी धूल उठाइए. क्या आप जानते हैं, कि इसमें क्या है? ये धूल कैसे बनी है? कहां बनी है? और आप तक कैसे पहुंची?

भारतीय संस्कृति में मानव देह को मिट्टी माना गया है. कबीर जैसे कई दार्शनिक कवियों ने अंत में धूल में मिल जाने की बातें भी कहीं हैं. क्या हम वाकई धूल से आए हैं? और हमें वापस एक दिन इसी धूल में खोकर बिखर जाना है? ये सवाल दार्शनिक-आध्यात्मिक होने के साथ-साथ वैज्ञानिक भी है.

वैज्ञानिकों को पहली बार सुदूर अंतरिक्ष में एक सुपरनोवा के अवशेषों में धूल की मौजूदगी के प्रमाण मिले हैं. सुपरनोवा में मौजूद धूल और आपके कदमों के नीचे की धूल में जैविक पदार्थों को छोड़ कोई और फर्क नहीं है.
इस सुपरनोवा के ऑब्जरेशन से एक पुराने सवाल का जवाब भी मिला है कि आखिर सितारों, ग्रहों और हम लोगों को बनाने के लिए जरूरी ‘रॉ मैटीरियल’ या कच्चा माल आखिर बनता कहां है?

एस्ट्रोनॉमी में ये सबसे लोकप्रिय और मजेदार तथ्य है, जिसे 1980 में कॉस्मस के लेखक कार्ल सगान से लेकर सभी प्रमुख एस्ट्रोनॉमर बार-बार दोहराते रहे हैं, कि हमारे शरीर, जिस हवा में हम सांस लेते हैं और हमारे पैरों के नीचे मौजूद जमीन में मौजूद ज्यादातर तत्वों (पानी यानि  H2O में मौजूद हाइड्रोजन को छोड़कर सबकुछ) का निर्माण सितारों की भट्ठी में हुआ है.  

पहले सितारे के जन्म लेने से पहले तक इस ब्रह्मांड में ज्यादा हाइड्रोजन ही था. कुछ मात्रा हीलियम और चुटकीभर लीथियम भी मौजूद था. ऑक्सीजन, कार्बन, नाइट्रोजन, सिलिकॉन और लोहा समेत सभी दूसरे तत्व उस थर्मोन्यूक्लियर रिएक्शन से बने हल्के परमाणुओं से अस्तित्व में आए जिससे सूरज और इसके अरबों भाइयों को ऊर्जा मिलती है. जैसे ही पहले सितारे की मौत हुई, ये सारे तत्व उस सितारे से फूटी स्ट्रीम के साथ चारों ओर बिखर गए.

ये सब पढ़कर ऐसा लगता है कि जैसे ये घटना बहुत पहले और अंतरिक्ष के किसी दूर-दराज के कोने में घटी होगी और इससे उन तत्वों का निर्माण हुआ होगा, जिन्होंने हमें बनाया. लेकिन चौंकाने वाला तथ्य ये है कि ये प्रक्रिया अब तक जारी है. उत्तरी चिली के हाई एटाकामा रेगिस्तान में मौजूद एटाकामा लार्ज मिलीमीटर –सब मिलीमीटर एरे टेलिस्कोप (अल्मा) के मल्टीपल एंटीना के इस्तेमाल से एस्ट्रोनॉमर्स ने ठंडी धूल के उस बादल को खोज निकाला है जिसका निर्माण एक सितारे की मौत से फूटे महासुपरनोवा से हुआ है. धूल का ये घना बादल हमारी आकाशगंगा मिल्की-वे से ठीक ऊपर मौजूद एक दूसरी आकाशगंगा के लार्ज मैगेलैनिक क्लाउड में मौजूद है.

इस कॉस्मिक विस्फोट के अवशेष को सबसे पहले 1987 में देखा गया था. आमतौर पर सितारों के मौत की घटना सुपरनोवा नंगी आंखों से नजर नहीं आती, इन्हें किसी ऑब्जरवेटरी के विशाल टेलिस्कोप्स से ही देखा जा सकता है. लेकिन एस्ट्रोनॉमी के इतिहास में 1604 की वो घटना बड़ी मशहूर है, जब सुदूर अंतरिक्ष में हुए एक सुपरनोवा धमाके को यहां धरती से नंगी आंखों से देखा गया था. इस घटना को बिना किसी उपकरण (तब तक टेलिस्कोप बना ही नहीं था) अपनी आंखों से देखने वाले शख्स थे  जोहान्स कैपलर, जिन्होंने 1604 में इस सुपरनोवा को नंगी आंखों से देखा था. ये सुपरनोवा इतना ताकतवर था कि इसकी रोशनी एक दशक तक धरती से नजर आती रही थी. लेकिन दुर्भाग्यवश, गैलीलियो अपना पहला टेलिस्कोप बनाते इससे पहले ही ये नजर आना बंद हो गया.

1987 में एस्ट्रोनॉ़मर्स ने हर उपलब्ध टेलिस्कोप का मुंह अंतरिक्ष में मरते हुए सितारों की ओर मोड़ दिया. इस अद्भुत प्रयोग से एस्ट्रोनॉमर्स सुपरनोवा की घटना को पहली बार देखने में कामयाब रहे. सुपरनोवा के इनीशियल फ्लैश के बाद जबरदस्त धमाके से फूटे शॉक वेव के साथ एक छल्ले की शक्ल में अंतरिक्ष में बिखरते उस मृत सितारे के तत्वों को पहली बार रिकार्ड किया गया. सुपरनोवा धमाके से फूटी ऊर्जा ने तेज रोशनी का एक छल्ला सा बना दिया.  

और अब चिली के टेलिस्कोप अल्मा से एस्ट्रोनॉमर्स ने सुपरनोवा के उस चमकीले छल्ले में ‘धूल’ खोज निकाली है. ये धूल उस मृत सितारे के अन्य तत्वों के साथ सघन होती जा रही है. घने होते जा रहे सुपरनोवा के इस बादल में कार्बन मोनो ऑक्साइड और सिलिकॉन ऑक्साइड जैसे तत्व हैं. आहिस्ता-आहिस्ता ये धूल गैस के इन बादलों में घुलमिल जाएगी. और किसी दिन, सघन होने की इस प्रक्रिया के चलते शायद कुछ लाख साल या फिर कुछ अरब साल बाद घूल और गैस का ये बादल घना होते-होते किसी नए सितारे या नए ग्रह या फिर किसी नए प्राणी को जन्म दे देंगे.

यूनिवर्सिटी कॉलेज आफ लंदन के एस्ट्रोनॉमर मिकाको मात्सुएरा बताते हैं, “ हरेक आकाशगंगा धूल-धक्कड़ से भरी पड़ी है. किसी आकाशगंगा के इवोल्यूशन में ये धूल ही सबसे अहम भूमिका निभाती है. आज हम जानते हैं कि इस धूल को धरती पर कई तरीकों से बनाया जा सकता है. लेकिन शुरुआती ब्रह्मांड में इस धूल को पैदा करने वाली बस एक ही चीज थी – सुपरनोवा. अब हमें इस सिद्धांत को साबित करने के लिए डाइरेक्ट एविडेंस भी मिल चुके हैं.”

धरती पर हर दिन 3 से लेकर 500 मीट्रिक टन तक धूल की अंतरिक्ष से बारिश होती रहती है. आसमान से हम पर बरसने वाली ये धूल वही है, जिसका निर्माण सुदूर सितारों की सुपरनोवा भट्ठी में होता है. आइए एक मुट्ठी धूल उठाएं. अब आप इसे मामूली नहीं समझ सकते, क्योंकि इसका निर्माण जाने कितने प्रकाशवर्ष दूर किसी सितारे की भट्ठी में हुआ है. आपकी एक मुट्ठी धूल में कई सूक्ष्म उल्का और धूमकेतु के कण भी मौजूद हैं. ये एक मुट्ठी धूल धरती पर मौजूद सबसे कीमती चीज से भी कई गुना कीमती है. ये धूल मानव को ब्रह्मांड से उसके रिश्ते की याद दिलाती है. ये धूल मामूली नहीं, बेशकीमती है. क्यों, है न !

संदीप निगम