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रविवार, 19 सितंबर 2010

मुझे कोई समझाए कि ये दुनिया आखिर भगवान ने कैसे बनाई : आइंस्टीन

मैं ये जानना चाहता हूं कि ये दुनिया आखिर भगवान ने कैसे बनाई। मेरी रुचि किसी इस या उस धार्मिक ग्रंथ में लिखी बातों पर आधारित किसी ऐसी या वैसी अदभुत और चमत्कारिक घटनाओं को समझने में नहीं है। मैं भगवान के विचार समझना चाहता हूं (1)। किसी व्यक्तिगत भगवान का आइडिया एक एंथ्रोपोलॉजिकल कॉन्सेप्ट है, जिसे मैं गंभीरता से नहीं लेता (2)। अगर लोग केवल इसलिए भद्र हैं, क्योंकि वो सजा से डरते हैं, और उन्हें अपनी भलाई के बदले किसी दैवी ईनाम की उम्मीद है, तो ये जानकर मुझे बेहद निराशा होगी कि मानव सभ्यता में दुनियाभर के धर्मों का बस यही योगदान रहा है।
मैं ऐसे किसी व्यक्तिगत ईश्वर की कल्पना भी नहीं कर पाता तो किसी व्यक्ति के जीवन और उसके रोजमर्रा के कामकाज को निर्देशित करता हो, या फिर वो, जो सुप्रीम न्यायाधीश की तरह किसी स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान हो और अपने ही हाथों रचे गए प्राणियों के बारे में फैसले लेता हो। मैं ऐसा इस सच्चाई के बावजूद नहीं कर पाता कि आधुनिक विज्ञान के कार्य-कारण के मशीनी सिद्धांत को काफी हद तक शक का फायदा मिला हुआ है ( आइंस्टीन यहां क्वांटम मैकेनिक्स और ढहते नियतिवाद के बारे में कह रहे हैं)। मेरी धार्मिकता, उस अनंत उत्साह की विनम्र प्रशंसा में है, जो हमारी कमजोर और क्षणभंगुर समझ के बावजूद थोड़ा-बहुत हम सबमें मौजूद है। नैतिकता सर्वोच्च प्राथमिकता की चीज है...लेकिन केवल हमारे लिए, भगवान के लिए नहीं (3)। 
ऐसी कोई चीज ईश्वर कैसे हो सकती है, जो अपनी ही रचना को पुरस्कृत करे या फिर उसके विनाश पर उतारू हो जाए। मैं ऐसे ईश्वर की कल्पना नहीं कर सकता जिसके उद्देश्य में हम अपनी कामनाओं के प्रतिरूप तलाशते हैं, संक्षेप में ईश्वर कुछ और नहीं, बल्कि छुद्र मानवीय इच्छाओं का ही प्रतिबिंब है। मैं ये भी नहीं मानता कि कोई अपने शरीर की मृत्यु के बाद भी बचा रहता है, हालांकि दूसरों के प्रति नफरत जताने वाले कुछ गर्व से भरे डरावने धार्मिक विचार आत्माओं के वजूद को साबित करने में पूरी ताकत लगा देते हैं(4)।
मैं ऐसे ईश्वर को तवज्जो नहीं दे सकता जो हम मानवों जैसी ही अनुभूतियों और क्रोध-अहंकार-नफरत जैसी तमाम बुराइयों से भरा हो। मैं आत्मा के विचार को कभी नहीं मान सकता और न ही मैं ये मानना चाहूंगा कि अपनी भौतिक मृत्यु को बाद भी कोई वजूद में है। कोई अपने वाहियात अभिमान या किसी धार्मिक डर की वजह से अगर ऐसा नहीं मानना चाहता, तो न माने। मैं तो मानवीय चेतना, जीवन के चिरंतन रहस्य और वर्तमान विश्व जैसा भी है, उसकी विविधता और संरचना से ही खुश  हूं। ये सृष्टि एक मिलीजुली कोशिश का नतीजा है, सूक्ष्म से सूक्ष्म कण ने भी नियमबद्ध होकर बेहद तार्किक ढंग से एकसाथ सम्मिलित होकर इस अनंत सृष्टि को रचने में अपना पुरजोर योगदान दिया है। ये दुनिया-ये ब्रह्मांड इसी मिलीजुली कोशिश और कुछ प्राकृतिक नियमों का उदघोष भर है, जिसे आप हर दिन अपने आस-पास बिल्कुल साफ देख और छूकर महसूस कर सकते हैं (5)।
वैज्ञानिक शोध इस विचार पर आधारित होते हैं कि हमारे आस-पास और इस ब्रह्मांड में जो कुछ भी घटता है उसके लिए प्रकृति के नियम ही जिम्मेदार होते हैं। यहां तक कि हमारे क्रियाकलाप भी इन्हीं नियमों से तय होते हैं। इसलिए, एक रिसर्च साइंटिस्ट शायद ही कभी ये यकीन करने को तैयार हो कि हमारे आस-पास की रोजमर्रा की जिंदगी में घटने वाली घटनाएं किसी प्रार्थना या फिर किसी सर्वशक्तिमान की इच्छा से प्रभावित होती हैं (6)।
सच्चाई तो ये है कि मेरे धार्मिक विश्वासों के बारे में आप जो कुछ भी पढ़ते हैं, वो एक झूठ के अलावा कुछ और नहीं। एक ऐसा झूठ जिसे बार-बार योजनाबद्ध तरीके से दोहराया जाता है। मैं दुनिया के किसी पंथ या समूह के व्यक्तिगत ईश्वर पर विश्वास नहीं करता और मैंने कभी इससे इनकार नहीं किया, बल्कि हर बार और भी जोरदार तरीके से इसकी घोषणा की है। अगर मुझमें धार्मिकता का कोई भी अंश है, तो वो इस दुनिया के लिए असीमित प्रेम और सम्मान है, जिसके कुछ रहस्यों को विज्ञान अब तक समझने में सफल रहा है (7)।
कॉस्मिक रिलिजन का ये एहसास किसी ऐसे व्यक्ति को करवाना बेहद मुश्किल है जो दुनियावी धर्मों के दलदल में गले तक धंसा हो और जो पीढ़ियों पुराने अपने धार्मिक विश्वास को छोड़, कुछ और सुनने तक को तैयार न हो। ऐसी ही धार्मिक अडिगता, हर युग के शिखर धर्म-पुरुषों की पहचान रही है, जिनके विश्वास तर्क आधारित नहीं होते, वो अपने आस-पास घटने वाली घटनाओं के लिए कारण नहीं तलाशते, यहां तक कि कई धर्म-नेताओं को तो ऐसा भगवान भी स्वीकार्य नहीं होता जिसका आकार मानव जैसा हो। हम सब प्रकृति की संतानें हैं, जिनका जन्म प्रकृति के ही कुछ नियमों के तहत हुआ है, लेकिन अब हम प्रकृति के उन नियमों को ही अपना ईमान नहीं बनाना चाहते। कोई भी चर्च ऐसा नहीं है, जिनके आधारभूत उपदेशों में इन नियमों की बात की गई हो। मेरे विचार से इस सृष्टि को रचने वाले प्राकृतिक नियमों के प्रति लोगों में सम्मान की भावना उत्पन्न करना और इसे आने वाली पीढ़ियों तक प्रसारित करना ही कला और विज्ञान की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है (8)।
मैं एक पैटर्न देखता हूं तो उसकी खूबसूरती में खो जाता हूं, मैं उस पैटर्न के रचयिता की तस्वीर की कल्पना नहीं कर सकता। इसी तरह रोज ये जानने के लिए मैं अपनी घड़ी देखता हूं कि, इस वक्त क्या बजा है? लेकिन रोज ऐसा करने के दौरान एक बार भी मेरा ख्यालों में उस घड़ीसाज की तस्वीर नहीं उभरती जिसने फैक्ट्री में मेरी घड़ी बनाई होगी। ऐसा इसलिए क्योंकि मानव मस्तिष्क फोर डायमेंशन्स ( चार विमाएं – लंबाई, चौड़ाई, ऊंचाई या गहराई और समय) को एकसाथ समझने में सक्षम नहीं है, इसलिए वो भगवान का अनुभव कैसे कर सकता है, जिसके समक्ष हजारों साल और हजारों डायमेंशन्स एक में सिमट जाते हैं (9)। इतनी तरक्की और इतने आधुनिक ज्ञान के बाद भी हम ब्रह्मांड के बारे में कुछ भी नहीं जानते। मानव विकासवाद की शुरुआत से लेकर अब तक अर्जित हमारा सारा ज्ञान किसी स्कूल के बच्चे जैसा ही है। संभवत: भविष्य में इसमें कुछ और इजाफा हो, हम कई नई बातें जान जाएं, लेकिन फिर भी चीजों की असली प्रकृति, कुछ ऐसा रहस्य है, जिसे हम शायद कभी नहीं जान सकेंगे, कभी नहीं (10)।
मैं बार-बार कहता रहा हूं कि मेरे विचार से व्यक्तिगत ईश्वर की अवधारणा बिल्कुल बचकानी है। लेकिन मैं व्यावसायिक नास्तिकों के उस दिग्विजयकारी उत्साह में भागीदारी नहीं करना चाहता जो अपनी बात मनवाने के जुनून में भरकर नौजवानो से उनके धार्मिक विश्वासों को छुड़वाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं। बल्कि, प्रकृति को समझने में अपनी बौद्धिक और मानवीय कमियों के साथ मैं विनम्रता भरे व्यवहार को प्राथमिकता दूंगा।
भविष्य का धर्म एक कॉस्मिक रिलिजन होगा। ये दुनियाभर के व्यक्तिगत भगवानों की जगह ले लेगा और बिना तर्क के धार्मिक विश्वासों और तमाम धार्मिक क्रिया-कलापों, कर्म-कांडों को बेमानी कर देगा। ये प्राकृतिक भी होगा और आध्यात्मिक भी, ये उन अनुभवों से बने तर्कों पर आधारित होगा कि सभी प्राकृतिक और आध्यात्मिक चीजें इस तरह एक हैं जिनका समझा जा सकने वाला एक अर्थ है। ये जो कुछ भी मैं कह रहा हूं, इसका जवाब बौद्ध धर्म में है। अगर कोई ऐसा धर्म है जो भविष्य में  आधुनिक वैज्ञानिक जरूरतों के साथ कदम से कदम मिला कर चल सकता है, तो वो बौद्ध धर्म ही होगा।
- अल्बर्ट आइंस्टीन   
References -
(1) (The Expanded Quotable Einstein, Princeton University Press, 2000 p.202)
(2) (Albert Einstein, Letter to Hoffman and Dukas, 1946)
(3) (Albert Einstein,The Human Side, edited by Helen Dukas and Banesh Hoffman, Princeton University Press)
(4) (Albert Einstein, Obituary in New York Times, 19 April 1955)
(5) (Albert Einstein, The World as I See It)
(6) (Albert Einstein, 1936, The Human Side. Responding to a child who wrote and asked if scientists pray.)
(7) (Albert Einstein, 1954, The Human Side, edited by Helen Dukas and Banesh Hoffman, Princeton University Press)
(8)  (The Expanded Quotable Einstein, Princeton University Press, p. 207)
(9) (The Expanded Quotable Einstein, Princeton University Press, 2000 p. 208)
(10)  (The Expanded Quotable Einstein, Princeton University Press, Page 208)

58 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही बढ़िया लगा लेख पढ़कर ........
    bookmark kar liya hai abhi pura nahi padha hai ....

    इसे भी पढ़कर कुछ कहे :-
    आपने भी कभी तो जीवन में बनाये होंगे नियम ??

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  2. बहुत ही जबर्हस्त लेख था ये,मैं भी विज्ञान और आइन्स्टीन की इन बातो से सहमत हु,पर दुनिया में साइंस के आलावा भी कई ऐसी चीजे है जिनको देख और समझने के बाद विज्ञान कमज़ोर होता दिखाई देता है,आइन्स्टीन ने कहा की प्राकृति की नियमबद्ध शैली का परिणाम हम है पर इंतनी जबरजस्त नियमबद्धता पृथ्वी पर ही क्यों है,और इंतनी जबरजस्त नियमबद्धता की उत्पत्ति का सिद्धांत क्या है,मरे विचार से इश्वर है या नहीं इस बात को जानने का तरीका सिर्फ एक ही है और वो है अद्ध्यात्म........चाहे जिसने भी इस दुनिया को बनाया हो या फिर ये स्वयम ही किसी घटना का परिणाम हो पर विज्ञान इसका सृजनकर्ता नहीं है वो सिर्फ इस परिणाम के उत्पत्ति के रहस्य को जानने की कोशिश कर रहा है जिसमे शायद वो अभी तक सिर्फ १० प्रतिशत ही सफल हुआ है !!!

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    1. Aapke vicharse sehmat hun 10% bhi hum jan nahi paye,koi shakti to hay jo itna sabkuchh kar sakti hay,magar Aainstain ki bat bhi sochne jaisi hay ki isvar ke darse bane hua dharm galat raste par hay,may isvar me pura visvas rakhta hun magar naititka hi asali isvar hay jo Aanand hi deta hay.

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  3. hahahah....air,water,earth,sunlight,sky.......the greatest combination that let the life survives....is creation of god...!!!!!!

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  4. आइन्स्टीन तो अब इस दुनिया में नहीं है .. आज अगर वो होते और FB पर स्वं ये सवाल पूछते तो मै सिर्फ उनसे यही पूछता कि आप जिस मशीन युग की बात कर रहे है वो सारी मशीन किसी न किसी सिद्धांत या मशीनी नियम के आधार पर कार्य करती है ... और वो नियम और सिद्धांत उन मशीनों ने स्वं अपने लिए नहीं बना लिए .. बल्कि उन मशीनों के लिए इन का निर्धारण मनुष्यों ने किया है और वो मशीने उन नियमो को लांघ कर बाहर नहीं जा सकती है .... और सोंचने की बात ये है कि हम ब्रह्माण्ड में कुछ भौतिक नियमों कि तो वकालत करते है .. लेकिन ब्रह्माण्ड के लिए ये नियम खुद कैसे बन गए .... इस का आज तक कोई आइन्स्टीन तार्किक जवाब नहीं दे सका है .... हम ये तो मानते है कि मशीन का पहिया खुद अपने आप नहीं घूमता है ... बल्कि मनुष्य (एक चेतन शक्ति) द्वारा बनाए गए नियम के आधार पर उस नियम में बंधकर घूमता है .... लेकिन हम सूरज और चाँद का घूमना .. बगैर किसी के घुमाए मानते है ...... क्या इस बात पर हंसी नहीं आना चाहिए ??

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    1. I appreciate you, We all with You Khan.

      raghavendra

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    2. Aor is Chaand aor Suraj ko ghumane wale ko kis ne banaya? Woh kahaN se aaya?

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    3. khanbhai Aapki bat sahi hay pure brhmand ki activity pure planing ke sath cha rahi hay,scintist mashinme jo siddhant dalte hay vo bhi pahlese he mojud hay fark itna ki hum use jante nahi the,instein ne bhi nastiko se jyada isvar me mannevalon ki tarfen ki hay,sabsebada isvar naitikta me hi hay ,may bhi usme visvas karta hun,einstein isvar nahi hay aisa bhi nahi bolte ,unka visvas prakruti se hay,magar Aage nahi socha ki prakruti bhi kisi anjan shakti ka hi karan hay jise hum isvar,allah,jisas,vaheguru Aadi kahte hay.

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  5. I believed god is note in the earth after reading this above chapter given be Dr.Arkmidiz

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  6. god is the creation of man .......man is not a creation of god .......we think that god is only a fill good , man can think that he is secure with god but acutually the man can make fool him self ...only man can help man not a god..

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  7. "If there is any religion that would cope with modern scientific needs it would be Buddhism."-
    Sir Albert Einstein

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  8. Buddha as a Scientist! In the "Aganna sutta" Buddha described, "the universe being destroyed and then evolving into its present form over a period of countless millions of years." Further Lord says, "The first life formed on the surface of water and again, over countless millions of years, evolved from simple into complex organisms. All these processes are without beginning or end, and are set in motion by natural causes."

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  9. "Buddhism start with Dont't Believe"
    "Other religion start with believe"
    That is the great differences in Buddhism and Other religions.
    In Buddhism there is a freedom of choices, in other religion you don't have choice

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  10. Buddha seems to me the most Logical person ever born on this Planet Earth. He strictly forbids his disciples to follow him blindly. He was the only Person in the History and in the Universe who gave the people right to disagree, besides the fact that he was a Prophet, Messenger and Enlightened one. Imagine How Great he was. How Self less he was. How Humble he was. How LOGICAL he was. How Authentic he was. Unbelievable. Thousands and Millions of blessings of All Mighty on My Buddha.

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  11. Do not believe in anything simply because you have heard it.
    Do not believe in traditions just because they have been handed down from many generations.
    Do not believe in anything just because it is spoken and rumored by many.
    Do not believe in anything just because it is found written in scripture books.
    Do not believe in what you have imagined,thinking that,because it is extraordinary,it must have been inspired by a supreme being or other wonderful beings.
    Do not believe in anything merely on the authority of your teachers ,elders and priests.

    But after thorough investigation and analysis, when you find that anything agrees with reason,and it is conductive to the good and benefit of one and all,then accept it and live up to it.

    The same test,said the Buddha must be applied to his own teaching.

    Do not accept my doctrine from reverence,but first try it as gold is tried by fire.
    -Lord Buddha(The light of asia)



    http://www.columbia.edu/itc/mealac/pritchett/00ambedkar/ambedkar_buddha/
    (for original book of Buddha & his dhamma)

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  12. From the begining of the world humans developed and changed the world... many scientist born...revolutions were seen...from bullock carts to supersonic and rockets were invented and developed.... human minds which dream and try to bring these in reality....but other than human beings are same as they were million years ago.Believing is natural!

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  13. jis cheej ka naam b aaj duniya me hai, vo cheej kabi na kabi to is duniya me avashya rahi hogi. koi TO shakti hai is duniya mae jo is sansar ko chala rahi hai.....

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  14. ‎* Aap hindi me roe the ki english me *
    ***************************************
    Bahut se log pet me abhimnyu ki chkrview kla seekhne ke bat pr yaken nhi krte honge ! leken ab science bhee is bat ko accept kr rha hai ke shishu maa ke pet me he ' Language ' seekhna shuru kr deta hai.

    Source :- University of varberg , sweden

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  15. लेख पढ़कर काफी अछा लगा आज क़ि जरुरत है यह.लोगो क़ि मानसिकता बदलने में सहायक होगा.naval soni

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  16. Nice Article..............
    Mind That This man Has greatest IQ on earth and few people are challenging his LOGIC...!!!

    Great n!!!

    This is INDIA Sir ji.

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  17. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  18. मैं इस लेख के सम्बन्न्ध में ये कहना चाहता हूँ की कुछ बातें उसने सही की हैं -
    १.-भगवान् व्यक्तिगत नहीं हैं.
    २ -भगवान् से डर कर भगवान को नहीं मानना चाहिए.
    ३ -धर्मो में विसंगतियां हैं !
    अब हम बात करते हैं विज्ञान की तो अभी तक भोतिक विज्ञान द्वारा ये सिद्ध नहीं किया जा सकता की इश्वर हे या नहीं !
    परन्तु अध्यात्म विज्ञान आपको ये प्रमाण दे सकता हैं ! परन्तु इसमें भी आपको एक शर्त माननी पड़ेगी जो की विज्ञान की ही शर्त हैं
    आपको प्रयोग करना पड़ेगा , जब तक आप प्रक्टिकल नहीं करोगे तब तक ये बहस ख़तम नहीं होगी !
    हमारे गुरुदेव कहते हे की इश्वर अनुभव का विषय हैं कथा प्रवचन का नहीं न ही वे विज्ञान का विरोध करते हैं हो सकता हे किसी दिन
    भोतिक विज्ञान इश्वर का पता लगा ले ! जब तक आप धर्म के आवरण से बाहर आकर काम नहीं करोगे तब तक आप इश्वर को नहीं जान सकते
    मेरे शब्दों में कहूँ तो एक नास्तिक आदमी जल्दी इश्वर को प्राप्त कर लेता हैं .जय गुरुदेव.

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  19. यह वही है जो बीज बनकर सृष्टि करता है तथा विस्तार करता है - अद्वैत वेदांत

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  20. Science is not a perfect tool which had discovered all the processes of discovering truth - it might be in future. the important thing is the "forces of nature" works between each and every particle of the universe even in between the brains and emotions of the people. We have very little knowledge of these NATURAL rules by now. So this is not the question of GOD's existence or non existence but the truth that is to be discovered. We have very very little knowledge about the world to reach a final answer - enjoy searching

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  21. अजमेर सिंह2 दिसंबर 2011 को 3:50 am

    आइस्टीन के लेख के सम्बन्ध में बहुत लोगों की टिप्पणियां दी गयी है उस लेख पर मेरी यह टिप्पणी कि आइस्टीन वैग्यानिक थे इसलिए विग्यान परक तथ्य प्रस्तुत किया लेकिन कुछ लोगों उनके विग्यानी कथन को अपने अल्प ग्यान के कथन को उससे भी ऊपर बताया है.

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  22. आज लोग भगवान को पूजते नहीं बल्कि वेह भगवान से डरते है क्यों के वे अपने आप को लाचार समजते है. और अन्धश्रधा से पीड़ित लोगों का फ़ायदा बाबा फकीर उठाते है.

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  23. निगम जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद , जो आपने एक अति महत्वपुर्ण जानकारी का अनुवाद किया । ये जानकारिया मानव के शोध का सबसे अह्म हिस्सा है ,इसके बिना मानव अन्धकार कदापि प्रकाशित नही हो सकते, आशा है भविष्य मे इससे संबन्धित और भी अनुवाद जुटाने का प्रयत्न करते रहेंगे ।

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  24. निगम जी आपका बहुत बहुत धन्यवाद , जो आपने एक अति महत्वपुर्ण जानकारी का अनुवाद किया । ये जानकारिया मानव के शोध का सबसे अह्म हिस्सा है ,इसके बिना मानव अन्धकार कदापि प्रकाशित नही हो सकते, आशा है भविष्य मे इससे संबन्धित और भी अनुवाद जुटाने का प्रयत्न करते रहेंगे ।

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  25. बहुत बढ़िया लेख...सराहनीय

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  26. संदीप भाई, आपने इस लेख को यहां रखकर और खासकर हिंदी मे इसका अनुवाद कर महत्वपूर्ण काम किया है।

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  27. बहुत हीं अच्छा लगा पढ़ कर......इस लेख एवं प्रत्युत्तरों ने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि आखिर ‘विज्ञान’ क्या है एवं क्या ‘विज्ञान’ और ‘भगवान’ एक दूसरे से विलोम हैं.

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  28. सराहनीय लेख......विज्ञान आखिर है क्या? प्रकृती मे विद्यमान नियम को जानना| विज्ञान कोई चमत्कार करनेवाली शक्ती नही है| ये ब्रह्मांड मे विद्यमान नियमो को जानकर संयोगोद्वारा, प्रयोगोद्वारा कुछ नया निर्माण करता है| विज्ञान अपनी मर्यादा मे है, ये कभीभी अंतिम दावेदार न था, न है, न रहेगा|.... ईश्वर अलग चीज है जिसकी परिभाषा उपर आईनस्टाईन ने अपने लेख मे प्रस्तुत की है| तथागत बुद्ध कहते थे 'ईश्वर है या नही इस संबंध मे मुझे कहना नही है|' इसी आधार पर अपने विचारोन्का वैज्ञानिक आईन्स्टाईन साहाब ने विस्तार किया है| इससे लगता है वे त. बुद्ध से प्रभावित थे|

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  29. ईश्वर और इंसान के बीच एक ही दीवार है-mind.इसे ढहा दें.ईश्वर सामने है.

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  30. If Einstein would have been alive.... I would have said that "the answer of your question lies in your's Special Theory Of Relativity".....

    and by the way universe exist in 2-phase Real and Imaginary...
    and things existing between this 2-phase is GOD..

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  31. m einstien ki bAATO se puri tarah sahamat hu lkin god bhi h is duniya me

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  32. हम भी सहमत है । पर जो भी हो ईश्वर तो है।

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  33. संदीप जी मैं आपसे मिलना चाहता हूँ, कृपा कर अपना ईमेल मेरे इमेल पर भेजने का कष्ट करेंगे, आभारी रहूँगा
    My E-mail- wgmrak@gmail.com, drishtipathindi@gmail, drishtipat@sify.com,
    www.drishtipatpatrik.blogspot.com

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  34. विज्ञान के लिए ही ठीक है

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  35. sandipji Aapka bahut bahut shukriya, lekh Aaccha hay aur vo bhi hindi me.

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  36. आधुनिकता की राख कभी इन चंद लाइनो को दबा न पायेगी

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